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Maghi purnima 2020: इस तारीख को है पूर्णिमा, ग्रह-गोचरों के खास संयोग में मनेगी माघ पूर्णिमा…

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नई दिल्ली :  पवित्र माघ मास की पूर्णिमा नौ फरवरी को है। यह मास भगवान भास्कर और श्रीहरि विष्णु का माह बताया गया है। इस मौके पर राजधानी सहित पूरे प्रदेश में नदी व सरोवरों में आस्था की डुबकी लगेगी। माघी पूर्णिमा पर स्नान व दान का खास महत्व है। मान्यता है कि इस दिन से ही कलयुग की भी शुरुआत हुई थी। महीनेभर से चल रहा कल्पवास भी संपन्न होगा।

पूर्णिमा आठ फरवरी की शाम 6.05 बजे से नौ फरवरी की दोपहर 1.05 बजे तक रहेगी।ज्योतिषाचार्य पीके युग ने शास्त्रों के हवाले से बताया कि इस बार माघी पूर्णिमा पांच महापुरुष योग में एक शश योग और चंद्राधि योग में मनेगी। जब चंद्रमा से केंद्र में शनि स्वग्रही होते हैं तो शश योग बनता है। वहीं चंद्रमा से छठे, सातवें और आठवें भाव में ग्रह होते हैं तो चंद्राधि योग बनता है। पद्म पुराण के मुताबिक माघ में जप-तप से भगवान विष्णु अधिक प्रसन्न होते हैं।

गंगा स्नान और दान से नरक से मुक्ति और बैकुंठ की प्राप्ति होती है। इस तिथि पर गोदान, तिल, गुड़ व कंबल का विशेष महत्व है।तारों की मौजूदगी में नदी व सरावरों में स्नान करना चाहिए। स्नान के बाद अपने आराध्य की पूजा, फिर श्रीविष्णु भगवान की पूजा करें। स्नान व ध्यान के बाद यथाशक्ति ब्राह्मण व गरीबों में दान व भोजन भी कराएं।ज्योतिषी युग के अनुसार माघ मास में देवता पृथ्वी पर निवास करते हैं। माघी पूर्णिमा पर शीतल जल गंगा में डुबकी लगाने से व्यक्ति पापमुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त करता है।

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार माघी पूर्णिमा पर स्वयं भगवान विष्णु गंगाजल में निवास करते हैं। गंगाजल का स्पर्शमात्र भी स्वर्ग की प्राप्ति करा सकता है। हिन्दू पंचांग के मुताबिक ग्यारहवें महीने यानी माघ में स्नान, दान, धर्म-कर्म का विशेष महत्व है। इस दिन को पुण्य योग भी कहा जाता है।

पूर्णिमा को भगवान विष्णु की पूजा करने से सौभाग्य और पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है।कल्पवास संपन्न होगा माघ पूर्णिमा पर मासभर का माघ स्नान संपन्न होगा। पूरे माघ में श्रद्धालु व तपी नदी के समीप एक महीने तक कल्पवास व तप करते हैं। ब्रह्म वैवर्त्य पुराण के अनुसार माघ पूर्णिमा के दिन स्नान के बाद दान करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।

सात्विकता का वरदान माघ पूर्णिमा पर महाकुंभ में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस दिन चंद्रमा भी अपनी सोलह कलाओं से शोभायमान होते हैं। पूर्ण चंद्रमा अमृत वर्षा करते हैं, जिसका अंश वृक्षों, नदियों, जलाशयों और वनस्पतियों पर पड़ता है।

मानव सेवा से ही ईश्वर की कृपा कलियुग में भगवान दलितों व फकीरों के वेश में रहते हैं। इसलिए ईश्वर को पाने में अधिक यत्न नहीं करना पड़ता है। मानव मात्र की सेवा से ही ईश्वर की साक्षात कृपा मिलती है। यह सेवा जब हृदय से जुड़ती है तो प्रार्थना बन जाती है। यह सबसे प्रिय होती है

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