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सबसे पहले गुरु नानक जी के घर से हुई थी ‘लंगर’ की शुरुआत, जानें क्या थी वजह….

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नई दिल्ली :   गुरुद्वारे में मिलने वाले लंगर यानी प्रसाद खाने के लिए सभी जाते हैं। सिर्फ खाने ही नहीं लोग निस्वार्थ भाव से लंगर में काम करने के लिए भी उत्साहित रहते हैं। सादा होते हुए भी लंगर के खाने का स्वाद बेहद स्वादिष्ट होता है। गुरु नानक जी कहा करते थे कि गुरु बनने का मतलब यह नहीं कि आप गद्दी पर बैठिए, बल्कि आम लोगों से मिलिए, उनके साथ खाना खाइए, उनसे बात कीजिए, तभी सच्ची खुशी मिलती है। गुरूद्वारे में सिर झुकाने के बाद दीवारों पर लगी जानकारी स्लेट तो सब ने पढ़ी होगी, पर क्या आप ये जानते हैं कि लंगर की शुरुआत कैसे हुई? आज हम आपको इसी लंगर के बारे में बताने जा रहे हैं।

कहा जाता है कि, एक बार सिखों के पहले गुरु नानक देव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए कुछ पैसे दिए, जिसे देकर उन्होंने कहा कि वो बाजार से सौदा करके कुछ कमा कर लाए। नानक देव जी इन पैसों को लेकर जा रहे थे कि उन्होंने कुछ भिखारियों को देखा, उन्होंने वो पैसे भूखों को खिलाने में खर्च कर दिए और खाली हाथ घर लौट आए। नानक जी की इस हरकत से उनके पिता बहुत गुस्सा हुए, जिसके बाद नानक देव जी ने कहा कि सच्चा लाभ तो सेवा करने में है। कहा जाता है कि, एक बार सिखों के पहले गुरु नानक देव जी को उनके पिता ने व्यापार करने के लिए कुछ पैसे दिए, जिसे देकर उन्होंने कहा कि वो बाजार से सौदा करके कुछ कमा कर लाए।

नानक देव जी इन पैसों को लेकर जा रहे थे कि उन्होंने कुछ भिखारियों को देखा, उन्होंने वो पैसे भूखों को खिलाने में खर्च कर दिए और खाली हाथ घर लौट आए। नानक जी की इस हरकत से उनके पिता बहुत गुस्सा हुए, जिसके बाद नानक देव जी ने कहा कि सच्चा लाभ तो सेवा करने में है।कहा जाता है कि लंगर नानक जी के घर पर ही शुरू हो गया था, जिसे आने वाले गुरुओं ने भी जारी रखा। वे कहते थे कि चाहे अमीर हो या गरीब, ऊंची जाति का हो या नीची जाति, अगर वह भूखा है तो उसे खाना जरूर खिलाओ। इसलिए स्वर्ण मंदिर में चार दरवाजे हैं। जो यही संदेश देते हैं कि व्यक्ति कोई भी हो, उनके लिए चारों दरवाजे खुले हैं।

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